
मुख्य संपादक सीपी सरगम
बांदा। “आश्वासन का अमृत” पीकर नरैनी ब्लॉक के ग्राम पंचायत डढ़वा मानपुर अंतर्गत कुम्हारनपूरवा के ग्रामीण अब थक चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान जब ग्रामीणों ने ‘रोड नहीं तो वोट नहीं’ का बिगुल फूंका था, तब आलाधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर जल्द सड़क बनवाने का वादा किया था। लेकिन चुनाव बीतते ही वे वादे कागजों और यादों से भी ओझल हो गए।
आजादी के दशकों बाद भी चारपाई बनी ‘एंबुलेंस’
हैरानी की बात यह है कि आज के आधुनिक दौर में भी इस गांव तक कोई चार पहिया वाहन नहीं पहुंच पाता। स्थिति यह है कि यदि कोई बीमार पड़ जाए, तो उसे मुख्य मार्ग तक पहुंचाने के लिए ग्रामीण चारपाई का सहारा लेते हैं। बारिश के दिनों में यह समस्या नरकीय हो जाती है, जहां पैदल चलना भी दूभर है। इसका सीधा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है, क्योंकि जलभराव और कीचड़ के कारण वे स्कूल नहीं जा पाते।
जमीन विवाद का बहाना और अधिकारियों की बेरुखी
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण में निजी जमीन का एक छोटा सा हिस्सा आड़े आ रहा है। ग्रामीण इस समस्या के समाधान के लिए भी तैयार हैं। उनका कहना है कि प्रशासन पैमाइश (नाप-जोख) करवाए; यदि किसी की निजी जमीन बीच में आती है, तो वे वैकल्पिक मार्ग से सड़क बनवाने को तैयार हैं। लेकिन विडंबना यह है कि उच्च अधिकारी इस संवेदनशील मामले को संज्ञान में लेने को तैयार नहीं हैं।
ग्राम प्रधान का दावा है कि उन्होंने अपने निजी खर्च से सड़क पर मिट्टी डलवाने का कार्य किया था ताकि रास्ता चलने लायक रहे, लेकिन पक्की सड़क के अभाव में स्थिति जस की तस बनी हुई है। बारिश होते ही मिट्टी दलदल में तब्दील हो जाती है।
सरकार से न्याय की गुहार
ग्रामीणों ने एक बार फिर सरकार और जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि उनकी इस मूलभूत समस्या का जल्द से जल्द समाधान किया जाए। क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, या फिर कुम्हारनपूरवा के लोगों को पक्की सड़क के लिए अगले चुनाव तक फिर से आश्वासन का ही इंतजार करना होगा?*चुनाव खत्म, वादे दफन: नरैनी के कुम्हारनपूरवा को मिली सिर्फ मिट्टी और आश्वासन,सड़क को तरस रहे ग्रामीण”*
बांदा। “आश्वासन का अमृत” पीकर नरैनी ब्लॉक के ग्राम पंचायत डढ़वा मानपुर अंतर्गत कुम्हारनपूरवा के ग्रामीण अब थक चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान जब ग्रामीणों ने ‘रोड नहीं तो वोट नहीं’ का बिगुल फूंका था, तब आलाधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर जल्द सड़क बनवाने का वादा किया था। लेकिन चुनाव बीतते ही वे वादे कागजों और यादों से भी ओझल हो गए।
आजादी के दशकों बाद भी चारपाई बनी ‘एंबुलेंस’
हैरानी की बात यह है कि आज के आधुनिक दौर में भी इस गांव तक कोई चार पहिया वाहन नहीं पहुंच पाता। स्थिति यह है कि यदि कोई बीमार पड़ जाए, तो उसे मुख्य मार्ग तक पहुंचाने के लिए ग्रामीण चारपाई का सहारा लेते हैं। बारिश के दिनों में यह समस्या नरकीय हो जाती है, जहां पैदल चलना भी दूभर है। इसका सीधा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है, क्योंकि जलभराव और कीचड़ के कारण वे स्कूल नहीं जा पाते।
जमीन विवाद का बहाना और अधिकारियों की बेरुखी
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण में निजी जमीन का एक छोटा सा हिस्सा आड़े आ रहा है। ग्रामीण इस समस्या के समाधान के लिए भी तैयार हैं। उनका कहना है कि प्रशासन पैमाइश (नाप-जोख) करवाए; यदि किसी की निजी जमीन बीच में आती है, तो वे वैकल्पिक मार्ग से सड़क बनवाने को तैयार हैं। लेकिन विडंबना यह है कि उच्च अधिकारी इस संवेदनशील मामले को संज्ञान में लेने को तैयार नहीं हैं।
ग्राम प्रधान का दावा है कि उन्होंने अपने निजी खर्च से सड़क पर मिट्टी डलवाने का कार्य किया था ताकि रास्ता चलने लायक रहे, लेकिन पक्की सड़क के अभाव में स्थिति जस की तस बनी हुई है। बारिश होते ही मिट्टी दलदल में तब्दील हो जाती है।
सरकार से न्याय की गुहार
ग्रामीणों ने एक बार फिर सरकार और जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि उनकी इस मूलभूत समस्या का जल्द से जल्द समाधान किया जाए। क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, या फिर कुम्हारनपूरवा के लोगों को पक्की सड़क के लिए अगले चुनाव तक फिर से आश्वासन का ही इंतजार करना होगा?



