“बागे नदी में गड्ढे, जिम्मेदारों की आंखों पर पट्टी” — बालू माफिया बेखौफ, सरकार मौन!
बागे नदी बनी “मौत का तालाब”: बालू माफिया की खुदाई, प्रशासन की चुप्पी!

बांदा – अतर्रा तहसील के तेरा ‘ब’
खंड में बहने वाली बागे नदी अब जलधारा कम और “मौत के गड्ढों” का जाल ज्यादा नजर आ रही है। आरोप है कि पोकलैंड और जेसीबी मशीनों से 10–15 फीट गहरे गड्ढे खोद दिए गए हैं। जहां कभी नदी कल-कल बहती थी, वहां अब हादसे का सन्नाटा पसरा है।
समाजसेवी राहुल त्रिपाठी (राहुल बाबा) का कहना है कि नदी की प्राकृतिक धारा को बेरहमी से उधेड़ा जा रहा है। सवाल यह है कि मशीनें गरजती रहीं, गड्ढे बनते रहे, लेकिन जिम्मेदारों के कानों तक आवाज क्यों नहीं पहुंची? क्या नदी की पुकार फाइलों में दब गई, या फाइलें ही कहीं और “बह” गईं?
ग्रामीणों का आरोप है कि बालू माफिया बेखौफ है और प्रशासन मौन साधे है। गांव वालों के मुताबिक, मवेशियों और बच्चों के लिए ये गहरे गड्ढे जानलेवा साबित हो सकते हैं। मगर व्यवस्था की प्राथमिकता शायद नदी नहीं, “रसीद” है।
राहुल त्रिपाठी ने चेतावनी दी है कि अगर तत्काल मशीनी खनन बंद कर गड्ढों को नहीं भरा गया, तो बड़ा जनआंदोलन होगा। अब सवाल जनता पूछ रही है—
क्या कानून की नजर सिर्फ आम आदमी पर है?
क्या नदी की सुरक्षा का ठेका भी माफियाओं के पास है?
और सबसे बड़ा सवाल— आखिर संरक्षण किसका है?
बाइट 1 – राहुल त्रिपाठी, समाजसेवी:
“नदी की धारा खत्म की जा रही है। अगर प्रशासन नहीं जागा तो हम सड़क पर उतरेंगे।”
बाइट 2 – सनी, ग्रामीण:
“गड्ढे इतने गहरे हैं कि कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है, लेकिन अधिकारी देखने तक नहीं आए।”
बागे नदी के गड्ढे सिर्फ मिट्टी में नहीं, सिस्टम की संवेदनहीनता में भी नजर आ रहे हैं। अब देखना है कि शासन जागता है या फिर अगली ‘दुर्घटना’ का इंतजार करता है।




