
मुख्य संपादक सीपी सरगम
बांदा। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में मौरंग (बालू) से लदे एक बेलगाम और ओवरलोड ट्रक ने जिस तरह एक ई-रिक्शा को रौंदा, वह सिर्फ एक सड़क दुर्घटना नहीं है। यह सीधे-सीधे सत्ता की हनक, चंद रुपयों के लालच और प्रशासनिक लापरवाही के गठजोड़ से हुआ एक ‘संस्थागत मर्डर’ है। इस रोंगटे खड़े कर देने वाले हादसे में 6 लोगों की असमय मौत ने एक बार फिर बुंदेलखंड की बदहाल व्यवस्था और सड़कों पर दौड़ते यमदूतों की हकीकत को बेनकाब कर दिया है।
कटघरे में परिवहन विभाग (RTO): चंद रुपयों के लिए खुली छूट क्यों?
सड़कों पर ओवरलोड वाहनों को रोकने की सबसे पहली और सीधी जिम्मेदारी परिवहन विभाग (RTO) की है। सवाल यह उठता है कि जब इन ओवरलोड ट्रकों को खदानों से लेकर हाईवे तक सफर करना होता है, तो आरटीओ के प्रवर्तन दल को ये नजर क्यों नहीं आते? क्या आरटीओ का अमला सिर्फ कागजों पर चेकिंग अभियान चलाता है? स्थानीय लोगों का सीधा आरोप है कि एंट्री फीस (महीने की बंधी-बंधाई रकम) के खेल के कारण ही इन ओवरलोड ट्रकों को सड़कों पर बेखौफ दौड़ने का ‘लाइसेंस’ मिल जाता है।
कटघरे में खनन और जिला प्रशासन: खदानों पर ‘कांटा’ सिर्फ दिखावा क्यों?
बांदा और बुंदेलखंड का इलाका अवैध खनन और मौरंग के ओवरलोडिंग के लिए बदनाम रहा है। नियम कहते हैं कि खदानों से निकलते वक्त ही ट्रकों का वजन (धर्मकांटा) होना चाहिए। अगर खनन विभाग और जिला प्रशासन अपनी जिम्मेदारी सही से निभाते, तो यह ओवरलोड ट्रक खदान से बाहर सड़क तक आ ही नहीं पाता। प्रशासन बड़े हादसों के बाद ही क्यों जागता है? क्या इससे पहले स्थानीय अधिकारियों को इन सड़कों पर उड़ती धूल और ओवरलोड वाहनों की कतारें दिखाई नहीं देतीं?
कटघरे में पुलिस:
खाकी की नाक के नीचे मौत का व्यापारक्षेत्रीय और यातायात (ट्रैफिक) पुलिस की भूमिका भी इस पूरे मामले में सबसे बड़े संशय के घेरे में है। बिसंडा थाना क्षेत्र की जिन सड़कों से होकर ये ट्रक गुजरते हैं, वहाँ जगह-जगह पुलिस चौकियाँ और पिकेट मौजूद होते हैं। इसके बावजूद एक ओवरलोड और अनियंत्रित ट्रक इतनी दूर तक चला आता है और गरीबों को कुचल देता है। पुलिस का काम सिर्फ दुर्घटना के बाद शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजना और रास्ता साफ कराना नहीं है, बल्कि अपराध और नियमों के उल्लंघन को रोकना भी है, जिसमें खाकी पूरी तरह नाकाम साबित हुई है।
कटघरे में सफेदपोश
सत्ता और खनन माफिया का साठगांठ बुंदेलखंड में मौरंग और बालू का कारोबार बिना राजनीतिक संरक्षण के मुमकिन नहीं है। सत्ता में बैठे रसूखदार नेताओं और खनन माफियाओं का गठजोड़ इतना मजबूत है कि अधिकारी भी इन पर हाथ डालने से कतराते हैं। जब तक इन सफेदपोशों की जेबें गर्म होती रहेंगी, तब तक सड़कों पर ऐसे ही गरीबों का खून बहता रहेगा। यह हादसा साफ तौर पर दर्शाता है कि सत्ता और पूंजीपतियों के मुनाफे के आगे आम आदमी की जान की कीमत कौड़ियों के भाव रह गई है।
सवाल अभी भी जिंदा है: कब थमेगा यह खूनी खेल?
हादसे के बाद प्रशासन ने मुआवजे और कार्रवाई का घिसा-पिटा आश्वासन तो दे दिया है, लेकिन बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित है—क्या इस हादसे के बाद वाकई बांदा की सड़कों से ओवरलोडिंग खत्म होगी? या फिर कुछ दिनों की सख्ती और दिखावे की कार्रवाई के बाद, मामला शांत होते ही मौत का यह ‘ओवरलोड’ कारोबार फिर से शुरू हो जाएगा? जनता अब सिर्फ ड्राइवर की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि इस खूनी खेल को चलाने वाले सफेदपोशों और भ्रष्ट अफसरों पर सख्त कार्रवाई चाहती है।




